Friday, October 21, 2011

लड़ रहे हैं गाँव

शहर की चाह में औंधे पड़े हैं गाँव
एक दलदली सी राह में उलटे पड़े गाँव


अजब सा जश्न है ये मेरे अपनों का
अदालतों के सामने कैसे खड़े हैं गाँव

दूर दूर तक बसेंगी बस्तियां उनकी
चिराग लेके भी ढूंढें नहीं मिलेंगे गाँव

खेत रोते हैं बारहाँ माटी रोती हैं
बस उनके जालों में फंसे मिलेंगे गाँव

वो बूढ़ा बरगद और वो छोटा मंदिर
ये कैसी आग में झुकते जा रहे हैं गाँव


ये पाप पाप होता रहेगा कब तक यूँ
पीढियां पूछेंगी कहाँ गए हैं गाँव

बचे रहेंगे अगर कट कट के टूटे फूटे से
कैसे कहेंगे लुट गए हैं गाँव

सलाम गाँव को उनकी माटी को
चलो बचाएं लड़ रहे हैं गाँव

..................................................अलका

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